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संकल्प

संकल्प

‘भई तू कौन से अस्पताल में जाने की सोच रहा है ?  मैं तो इसी अस्पताल में अपनी जाॅब के लिए अप्लाई करूँगा ?’ डाॅक्टर संजय ने डाॅक्टर समर्थ को कहा ।  दिसम्बर का महीना था ।  आज कुछ नवोदित डाॅक्टरों की इन्टर्नशिप पूरी हो गई थी और सभी के चेहरों पर संतुष्टि और खुशी थी ।  देश की राजधानी दिल्ली के मशहूर सरकारी अस्पताल तथा मैडिकल इन्स्टीट्यूट में अपनी इन्टर्नशिप के दौरान अनेक युवा भविष्य में डाॅक्टर बनने का सपना सँजोये रोगियों की सेवा में लगे रहते थे ।  डाॅक्टरी की अलग अलग विधाओं में पारंगत होने की यह शुरुआत होती है ।  हरेक की अपनी अपनी रुचि रहती है ।  देश के सरकारी अस्पताल जहाँ एक ओर गरीबों और असहायों के लिए वरदान होते हैं वहीं इन अस्पतालों में कार्यरत वरिष्ठ डाॅक्टरों का अनुभव इतना अधिक विस्तृत होता है कि सामथ्र्यवान और समृद्ध परिवारों से भी लोग अपने इलाज के लिए इन्हीं अस्पतालों पर भरोसा करते हैं ।  यह सत्य है कि इन अस्पतालों में समाज के जिस तबके से रोगी आते हैं वे अनेक समस्याओं से ग्रस्त होते हैं ।  विभिन्न रोगों का इलाज करते करते एक विस्तृत अनुभव हो जाता है । 

डाॅक्टर समर्थ की भी इच्छा थी कि वह भी इसी अस्पताल में जाॅब करें और विस्तृत अनुभव करें पर कुछ विशेष परिस्थितियों के चलते उन्हें अपने पैतृक स्थान जाना पड़ रहा था अतः उन्होंने वहीं या उसके नज़दीक ही जाॅब करने का विचार बनाया ।  डाॅक्टर संजय ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं ।  इसी दौरान डाॅ. संजय की इच्छा पूर्ण हो गई थी और उन्हें इसी अस्पताल में जाॅब मिल गई थी ।  डाॅ. संजय बाल रोग विशेषज्ञ बनने की दिशा में प्रयत्न कर रहे थे और जी जान से मेहनत कर रहे थे ।  ड्यूटी पर समय से पहुँचते थे और बाल रोग विशेषज्ञ होने के नाते छोटे बच्चों के साथ आये माता-पिता या अभिभावकों से बहुत अच्छे से बात करते थे तथा भली प्रकार जाँच करके उचित इलाज किया करते थे जिससे रोगी बालक जल्दी ही स्वास्थ्य लाभ करने लगता था ।  समय बीतता गया और डाॅ. संजय की लोकप्रियता भी बढ़ती गई ।  लोगों की भी यह इच्छा होती थी कि उनके रोगी बालकों का इलाज डाॅ. संजय द्वारा ही हो ।  डाॅक्टर का जीवन भी अनेक अनुभवों से युक्त रहता है ।  ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है जब बेहतर से बेहतर इलाज करने के बाद परिणाम ईश्वर पर छोड़ दिया जाता है ।  इन्हीं क्षणों में कुछ दुःखद क्षण भी होते हैं जब रोगियों के साथ आए परिजनों की चीत्कार ही सुनाई देती है ।  पर ईश्वर का फैसला तो हरेक को मंजूर करना पड़ता है ।

ऐसी ही एक घटना के चलते डाॅ. संजय के पास एमरजेन्सी ड्यूटी के दौरान एक नन्हें बालक का केस आया जिसे गम्भीर बीमारी हो गई थी ।  बालक की माता बालक को गोदी में लेकर आई थी ।  बालक 2-3 बरस का रहा होगा ।  माता बहुत ही निर्धन परिवार की थी ।  बालक की जाँच करने के बाद डाॅ. संजय गहन सोच में डूब गए थे ।  उन्होंने बालक को अस्पताल में दाखिल कर लिया था और बालक तथा उसकी माता के लिए एक बैड अस्पताल में दे दिया गया था ।  बालक के रोग की गम्भीरता को देखते हुए डाॅ. संजय ने अस्पताल में उपलब्ध बेहतरीन दवाइयां दी थीं ।  दो दिनों के अथक प्रयास के बाद रात्रि 10 बजे दुखद क्षण आया और ईश्वर के निर्णय के समक्ष झुकना पड़ा ।  बालक की माता विलाप कर रही थी ।  डाॅ. संजय ने ढाढस बंधाते हुए अस्पताल की सारी काग़जी कार्रवाई खुद अपने निरीक्षण में बिना समय गँवाए पूरी करवाई और बालक की माता को अस्पताल से जाने की इजाज़त मिल गई थी ।  भरे मन और भारी कदमों से डाॅ. संजय रात्रिकालीन ड्यूटी करने के बाद लौट गए ।  यूँ तो डाॅक्टरों को ऐसे अवसरों पर अपना मन कड़ा करना पड़ता है पर अन्ततः वे भी इन्सान होते हैं और उनमें भी मानवीय संवेदनाएँ होती हैं ।  डाॅक्टरी पेशा अपनाते समय डाॅक्टर इन तथ्यों से वाक़िफ़ होते हैं ।

अगली सुबह 5 बजे डाॅ. संजय अस्पताल ड्यूटी पर एक और केस देखने जल्दी आ रहे थे तो उन्होंने अस्पताल के गलियारे में फर्श पर उसी माता को बालक को अपने अंक में दबाए देखा ।  ‘माता जी, आप अभी तक गई नहीं ।  मैंने तो सारी काग़जी कार्रवाई पूरी करवा दी थीं ।  आपको क्यों रोका हुआ है और आप इस तरह से फर्श कर क्यों बैठी हैं ?  मैं अभी नर्स से बात करता हूँ ।’ कहते हुए डाॅ. संजय नर्स को पुकराने ही लगे थे कि माता ने डाॅ. संजय के पैर पकड़ लिये और रोते हुए विनती की ‘डाॅक्टर साहब मैं चली जाऊँगी ।  मुझे थोड़ी मोहलत दे दीजिए ।  मैं तो रात को ही बालक को ले जाना चाहती थी पर आॅटो वालों का किराया नहीं भर सकती थी ।  मेरे पास कुल दस रुपये ही थे ।  अभी सुबह होने को है ।  कुछ ही देर में सरकारी बसें चलने लगेंगी तो मैं यहाँ से सरकारी बस लेकर उसमें चली जाऊँगी ।  बच्चे को अंक में दबाए रखूँगी ।  बच्चों का तो वैसे ही कोई टिकट नहीं लगता ।  बस मुझे उजाला होने तक का समय दे दीजिए ।’ माता गिड़गिड़ाए जा रही थी और डाॅ. संजय की आँखों से अश्रुओं की अविरल धारा बहे जा रही थी ।  वे कुछ भी कहने की या पूछने की स्थिति में नहीं थे ।  बहुत मुश्किल से खुद को संभालते हुए उन्होंने माता को वहीं बैठने को कहा और बोले ‘मैं कुछ देर में आता हूँ, तुम यहीं रुकना’ ।  डाॅ. संजय ने अपने सहयोगी डाॅक्टर को उस केस को संभालने के लिए कहा जिसके लिए वह जल्दी आए थे और खुद अस्पताल के परिसर में स्थित बैंक के एटीएम की ओर बढ़ गए ।  माता के पास वापिस लौटे तो उनके हाथ में पाँच हज़ार रुपये थे ।  उन्होंने अपने ड्राइवर को बुलाया और निर्देश दिया ‘भई इस माता को इसके घर तक पहुँचा दो और जब तक यह सारे क्रियाकर्म न करवा ले तुम इसके साथ ही रहना ।  और हाँ, ये पाँच हजार रुपये रखो ।  खर्च होने के बाद जो बच जायें वे इस माता को दे देना ।  कोई और ज़रूरत हो तो मुझे इत्तला कर देना ।’ फिर माता की ओर मुखातिब होते हुए बोले ‘यह तुम्हारे साथ जायेगा और तुम अपने सभी कार्य करवाने के बाद इसे वापिस भेज देना ।  इसे मैंने पाँच हज़ार रुपये दिये हैं ।  जरूरत के हिसाब से खर्च होने के बाद जो बच जायेंगे वे तुम्हें दे देगा ।’ यह कहते-कहते डाॅ. संजय का गला भर आया था ।  वे सोच रहे थे कि देश की गरीबी का दुःख मनाऊँ या इस माता का ।  अचानक उनका ध्यान गया कि माता उनके पैर छूने को है तो वे एकदम पीछे हट गये और वार्ड में चले गए ।  वार्ड में पहुँच कर उन्होंने संकल्प लिया कि नये वर्ष से वह हर महीने अपनी तनख्वाह में से दस फीसदी अलग निकाल कर ऐसे लोगों की मदद के लिए एक कोष बनायेंगे ।  यह संकल्प लेने के बाद उनका मन कुछ हल्का हो गया था ।

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