‘अम्मा, अम्मा ….. अम्मा, अम्मा’ अंकुरित मूंग बेचने वाला झम्मन बूढ़ी अम्मा के दरवाजे पर खड़ा होकर आवाजें लगा रहा था। ‘क्या बात हो गई, रोज़ मेरा इन्तज़ार करती थीं और आज मेरी आवाज़ सुनकर भी किवाड़ नहीं खोल रही। ‘अम्मा, दरवाजा खोलो, मैं झम्मन हूं, तुम्हारे लिए मूंग लाया हूं, मसालेदार, नरम-नरम, खट्टी-मीठी इमली की चटनी डाल कर, ऊपर से नींबू की दो बूंदें भी डालूंगा हर बार की तरह’ झम्मन उसके छाबे के पास आ खड़े एक-दो ग्राहकों को निपटाते हुए कह रहा था। ‘भाई, प्याज ज़रा और डाल देना, और धनिया भी डाल, उसके बिना स्वाद कैसे आयेगा’ एक ग्राहक कह रहा था। ‘बाबू जी, प्याज तो महंगा है ही, धनिया तो आसमान छू रहा है, मंडी में तीन सौ रुपये किलो है, इसलिए धनिया तो नहीं लाया, क्योंकि न मुझे वारा खायेगा और न ही आप जैसे मेरे ग्राहकों को, एकाध महीना और रुकिए फिर खूब धनिया डाल कर खिलाऊंगा, पिछली कसर भी निकाल दूंगा’ झम्मन ने दोना पकड़ाते हुए कहा। फिर उसे यकायक ध्यान आया ‘अरे अम्मा को क्या हुआ, आज तो किवाड़ ही नहीं खोल रहीं। लगता है मैं गांव चला गया और वापिस आने में सात आठ दिन लग गये तो अम्मा नाराज़ हैं’ कहते-कहते झम्मन ने ...
आम का बड़ा दरख़्त उम्रदराज हो चुका था । ऋतु अनुसार फल भी कम लगने लगे थे । आसपास के दूसरे आम के दरख़्तों पर मीठे आमों की बहार रहती थी । उम्रदराज़ आम के दरख़्त पर एक परिन्दा बचपन से वहीं पला और मीठे आम खाकर बड़ा हुआ था । आमों के साथ-साथ उसे उस दरख़्त से भी अपार प्रेम हो गया था । ‘मालिक, हमारे आमों के बगीचे में सैंकड़ों आम के दरख़्त हैं । मौसम के हिसाब से सभी दरख़्तों पर खूब आम लगते हैं । आमदनी भी खूब होती है । पर यह दरख़्त अब फल देने योग्य नहीं रहा । आम भी बहुत कम लगते हैं और जो लगते भी हैं तो वे परिन्दे चोंच मार कर खा जाते हैं । अब इससे उतनी आमदनी भी नहीं हो रही । ऐसे में क्या आम के इस दरख़्त को इसी तरह रहने दिया जाये या इसे काट कर इसकी लकड़ी बेच दी जाये और धन कमाया जाये । कटे हुए आम के दरख़्त की जगह आम के दरख़्त का नया बीज बो दिया जाये ।’ माली ने मालिक से पूछा । ‘हम कल बात करेंगे’ मालिक ने कहा और घर चला गया । ‘आपकी बात मैंने सुनी । मेरे ख्याल में तो आम के इस दरख़्त को अभी लगा ही रहने द...