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सुनो मेरी कहानी



मेरा नाम राज रानी खन्ना है। वर्ष 2020 के अगस्त माह की 15 तारीख होते ही मैं 83 बरस की हो जाऊंगी।  सुदर्शन ने मुझे कम्प्यूटर पर देखकर बताया कि आपकी आयु 83 बरस या 996 माह या 4330 सप्ताह 6 दिन या 30,316 दिन या 727,584 घंटे या 43,655,040 मिनट या 2,610,302,400 सैकेण्ड्स होगी। इतनी गणना सुनकर ताज्जुब हुआ।  मैं इसे अपना सौभाग्य समझती हूं कि मेरा जन्म 15 अगस्त को हुआ।  मेरी मातृभूमि का जन्म भी मेरे लिए तो 15 अगस्त को हुआ।  एक दशाब्दी का फर्क है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो मेरी आयु 10 बरस की थी लेकिन उन दिनों हुई घटनाओं ने जीवन के इतने अधिक अनुभव दे दिये कि उस समय लगने लगता कि मैं दस बरस से कहीं अधिक आयु की हूं। 


मेरा जन्म 15 अगस्त 1937 को पाकिस्तान के शहर मुलतान के जिस मोहल्ले में हुआ उसका नाम था ‘कोत्रा’।  अपने पिता स्व. श्री चेतनदास मल्होत्रा और माता स्व. प्रकाशवती मल्होत्रा की मैं सबसे बड़ी सन्तान हूं और आज आप सभी के मुखातिब हूं। मेरी कहानी का यह अंश पढ़ने वाले कुछ ऐसे भी होंगे जो उस समय के होंगे और मेरी कहानी पढ़कर खुद को एक बार फिर उस समय से जोड़ पायेंगे।  बेशक हमने 15 अगस्त 1947 को आजादी पायी पर इसे पाने के लिए जिन मंज़रों से हम गुज़रे वह बहुत ही भयानक थे।  ईश्वर न करे किसी पीढ़ी को वैसे मंज़रों से गुजरना पड़े।


जब मैं 5 बरस की थी तो मुझे पाठशाला भेजा गया। यह वह समय था जब हमारे मास्टर या मास्टरनियां बहुत दिल से पढ़ाते थे।  सबसे बड़ी बात वे सब बच्चों को अपना बच्चा समझते थे।  मुझे याद है कि उस समय पाठशाला में अंग्रेज़ औरतें नियमित रूप से चैकिंग के लिए आया करती थीं।  वे साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखती थीं।  हमें भी यह सब अच्छा लगता था।  चैकिंग के दौरान वे देखतीं कि बालों में तेल लगा है या नहीं, बालों में जुएं तो नहीं हैं, कपड़े साफ-सुथरे हैं या नहीं, किताब-कापी रखने वाला बस्ता साफ है या नहीं।  यदि वे देखतीं कि किसी लड़की के बाल बेतरतीब हैं तो वे खुद ही कंघी लेकर उसके बाल बनाया करतीं।  किसी के बालों में जुएं नज़र आतीं तो वे प्रेम से बैठकर जुएं खुद ही निकाल दिया करतीं। मगर गुस्सा कभी नहीं करतीं और हंस के समझातीं।  आप बताइए आज कहीं ऐसा दिखने को मिलेगा?  कहीं नहीं।


उस समय शादियां छोटी आयु में ही हो जाया करती थीं।  लड़कियों के अकेले आने जाने में कोई डर नहीं होता था।  हम भाई-बहन जब 6-7 साल के होते थे तो रात के 12 बजे भी आराम से नानी के घर चले जाते थे।  हां, मैं बता दूं कि मेरे दो भाई और एक बहन हैं।  मोहल्ले की शादियों में रतजगे होते थे यानि रात भर जागकर रौनकें लगा करती थीं।  औरतें सोने के गहने पहन कर निकलती थीं और डर जैसी कोई बात नहीं होती थी। कभी-कभी ऐसा होता कि छोटे बच्चे घर से अनजाने में निकल जाते और रास्ता भूल जाने के कारण रोते।  यह मालूम होने पर कि वह बच्चा रास्ता भटक गया है उसे कंधे पर बिठा कर बाजारों और गलियों में घंटा बजा-बजा कर घुमाया जाता था। और इस मेहनत के बाद वह बच्चा अपने परिवार से मिल ही जाता था।  ऐसे दृश्य भी देखने वाले होते थे। बहुत ही अपनापन था।


मेरे नाना जी इठार नामक स्थान के पास छंछर मंगल वाली गली मंे रहा करते थे।  हमने भी कुछ समय बाद छंछर वाली गली से थोड़ा दूर जाकर मकान लिया।  जिस गली में हमारा मकान था उस गली से एक और गली जुड़ती थी जिसका नाम था ‘कोटली गली’।  कोटली गली के खत्म होते ही केसना नामक हकीम की दुकान थी।  मुझे याद है कि केसना हकीम मीठे शरबत के साथ दवाई पिलाने के लिए मशहूर होता था।  उसके हाथों में खूब शफा थी।  उसके इलाज से बीमारी जल्दी दूर हो जाती थी।  दूर-दूर से लोग उससे इलाज करवाने आते थे।


हकीम की दुकान से आगे एक कुंआ था।  उस कुएं का पानी गजब का मीठा और एकदम साफ-सुथरा था।  लोग वहां से पानी भर कर ले जाया करते थे। वैसे भी उस समय पानी बहुत ही साफ मिला करता था।  आजकल तो गंदा पानी मिलता है जिसे साफ करने के लिए कई तरह की मशीनें लगानी पड़ती हैं फिर भी पानी शुद्ध मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं।  गंदा पानी तो मानो छोटी-बड़ी कंपनियों के लिए फायदे का सौदा हो गया है।  


हकीम वाली गली से अगर बाहर की ओर निकल जाते तो वहां एक और बहुत ही मशहूर हकीम था जिसे हकीम द्वारका मल्होत्रा के नाम से जाना जाता था।  द्वारका हकीम इतना काबिल था उसके जबर्दस्त दिमाग का मुलतान में उस वक्त की अंग्रेज सरकार ने मोल लगाया था।  अभी बच्चों ने मुझे शकुन्तला देवी फिल्म दिखाई जो देखते ही देखते मुश्किल से मुश्किल सवाल हल कर देती थी। ठीक वैसे ही द्वारका हकीम उसके यहां आने वालों को उनकी चाल से ही पहचान कर बता देता था कि उसे क्या बीमारी है।  उसकी इसी खासियत ने अंग्रेजों को दांतों दले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था।  जब उससे पूछा जाता कि यह तुम कैसे कर लेते हो तो वह हंसते हुए कहता मेरे अन्दर भगवान बैठा है वही इलाज करवाता है मैं थोड़े ही करता हूं।  बहुत अधिक गंभीर रोगी को देखते ही बता देता कि वह कितने दिन का मेहमान है।  हमारा पूरा परिवार जरूरत पड़ने पर उन्हीं से इलाज करवाता।  यह पानी में दवाई की कुछ बूंदें मिलाकर पिलाता था।  मैंने अपने अब तक के जीवन मंे द्वारका हकीम जैसा कोई हकीम नहीं देखा।  बाद में बताया गया था कि वह मेरी दादी का रिश्तेदार था।  मेरा जन्म भी मल्होत्रा परिवार में हुआ था जैसा मैंने ऊपर बताया है।  उस समय के लगभग सभी लोग यह जानते होंगे कि उस समय के हकीम नब़्ज देखकर ही बीमारी बता दिया करते थे।


जब हमने कोत्रा मोहल्ले में अपना मकान बनाया तो उस गली के बाहर निकलते ही अंग्रेज़ी दवाइयों से इलाज करने वाला डाक्टर बैठता था।  उस डाक्टर का नाम ‘फारसी’ था।  वह भी कमाल का काबिल डाक्टर था।


उस समय की यादें मुझे ले चली हैं डाक्टर फारसी से थोड़ा आगे जाकर एक हलवाई की दुकान पर।  बहुत बड़ी दुकान थी, नाम याद नहीं आ रहा है।  यहां पर बने पकवान दूर दूर तक मशहूर थे।  केले के पत्तों से बने ‘दोनों’ में वह दाल के छोटे साइज के समोसे परोसता और साथ में धनिए प्याज की चटनी।  खाते समय तो मानो कोई गिनती ही नहीं होती थी।  उस समय हलवाई तड़के सुबह ही खुल जाते थे।  मशहूर नाश्तों में मालपुए, पूरियां और हलवा शामिल होते थे।  लगभग सभी जानते होंगे कि उस समय देसी घी ही प्रयोग होता था।  चार आने सेर देसी घी मिलता था। सेर का मतलब एक किलो से 70-80 ग्राम कम।  मलाईदार दूध से बना कुलफी फलूदा एक नये पैसे का जिसे हमारे समय में छोटा पैसा कहते थे।  उस समय पैसों के साथ-साथ कौड़ियों से भी वस्तुएं खरीदी जाती थीं।  आपने सुना होगा कभी-कभी कहा जाता है कि अमुक चीज कौड़ियों के दाम बिक गई। 


उस जमाने में मैं बताती हूं कि फूटी कौड़ी से कौड़ी, कौड़ी से दमड़ी, दमड़ी से धेला, धेले से पाई, पाई से पैसा, पैसे से आना, आना से रुपया बना।  अगर किसी के पास 256 दमड़ी होती थी तो वह 192 पाई के बराबर होती थी।  ये सब बातें जो बता रही हूं मुझे इतनी अच्छी तरह से तो याद नहीं हैं मगर सुदर्शन ने गूगल पर देखकर बताया है। इसी तरह 128 धेला, 64 पैसे व 16 आना 1 रुपये के बराबर होते थे।  यानि 128 धेले का एक रुपया, 64 पैसे का एक रुपया (ये पुराने पैसे हैं, आज वाले नहीं), 16 आने का एक रुपया।  यह तो सभी ने सुना होगा कि सोलह आने सच।  अब कौड़ी की बात करें तो तीन फूटी कौड़ी को एक कौड़ी माना जाता था और 10 कौड़ी को एक दमड़ी कहा जाता था।  दो दमड़ी से एक धेला, डेढ़ पाई से एक धेला, तीन पाई को एक पैसा बताया था।  तब चार पैसा एक आने के बराबर होता था।  छह आने की एक चवन्नी होती थी। पर इसमें भी एक पैसे का फर्क होता था।  चवन्नी पच्चीस पैसों से मिलकर बनती और छह आने में 24 पैसे होते थे।  एक-एक पैसा मोल रखता था। अठन्नी में पचास पैसे होते थे।  एक, दो, तीन, पांच, दस, बीस के सिक्के भी प्रचलन में आए।  अब तो सभी बन्द हो गए हैं। कम से कम मुद्रा एक रुपया माना जा रहा है। पैसों का हिसाब तो अब भी होता है मगर उसे कम या ज्यादा कर पूरा रुपया बनाकर हिसाब कर लिया जाता है। 


जेवरातों की बात करूं तो सोना और चांदी बहुत सस्ते थे।  चांदी को तो कोई पूछता ही नहीं था।  सूटों और वैलवैट की शालों पर खरे सोने या चांदी की कढ़ाई होती थी। 


जब 1947 का समय आया तो शहर में छुटपुट लड़ाइयां होनी शुरू हो गई थीं।  धार्मिक उन्माद बढ़ता जा रहा था।  धीरे-धीरे ये लड़ाइयां बड़ा रूप लेती गईं और बलवा तथा मारकाट में बदलती गईं।  घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया।  हर तरफ आग की लपटें दिखाई देतीं।  मारकाट, चीखें, चिल्लाहटें मानो बस यही कुछ रह गया था।  यह पहला ऐसा अवसर था जब हमने किसी डर का नाम सुना था।  रातों को नींद नहीं आती थी।  मोहल्ले के पुरुष सिर पर मोटी चप्पलें और फिर उस पर कपड़े का साफा जैसा बांध कर पहरा दिया करते थे।  हमें हिदायत थी कि किसी के हाथ लगाने से पहले अपनी जान दे देनी है।  बिजली की तारें खुली छोड़ दी जाती थीं ताकि हम खुद को करंट लगाकर मार सकें पर इज्जत बनी रहे।  धार्मिक उन्मादों ने उन परिवारों में भी नफरत की दीवारें खींच दीं जहां एक साथ बैठकर रोटी खाई जाती थी।  हम छतों से छुप-छुप कर देखते।  मासूमों को पकड़ कर उनके मां-बाप के सामने ही जिन्दा आग में झोंक दिया जाता।  


मैं अपने परिवार के साथ हवाई जहाज पर बम्बई पहुंचे। यहां हमारे कुछ संबंधियों ने हमारे नाम से सीटें हवाई जहाज में बुक करा दी थीं।  काफी लोग रेलगाड़ियों पर आये।  रेलगाड़ियों में इतनी भीड़ होती कि मुसाफिर छतों पर सफर करते।  सांस लेना भी दूभर हो जाता। जान बच जाये यही ईश्वर से प्रार्थना की जाती थी।  पाकिस्तान से हिन्दुस्तान पहुंचने वाले जब रास्तों के मंज़र बयान करते तो रोंगटे खड़े हो जाते थे।  बम्बई में कुछ दिन रहने के बाद हम लोग अहमदाबाद, गुजरात में अपने मामा स्व. श्री गुलाबराय जी के यहां आ गये।  यहां की बाम्बे मार्केट में हमारे मामा जी की कपड़ों की दुकान थी।  


कुछ समय अहमदाबाद में बिताने के बाद आखिर हम दिल्ली आ गये तथा पुरानी दिल्ली स्थित फराशखाने की गली समोसान में रहने लगे।  यहां काफी समय रहे। 


सुदर्शन के पिता का नाम श्री कृष्ण कुमार खन्ना है।  वह बहुत ही सुन्दर विचारों वाले इन्सान थे।  उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया।  अपना सारा काम स्वयं कर लिया करते थे।  यहां तक कि जरूरत पड़ने पर रोटी सब्जी भी खुद बना लिया करते थे।  स्वभाव के अत्यन्त शान्त।  मेरे स्व. ससुर जी कहा करते थे कि यह कोई देवात्मा/तपस्वी था जिसकी तपस्या में विघ्न पड़ने पर उसने मनुष्य का चोला पहना।  झूठ बोलने वालों से इन्हें सख्त नफरत थी।  अपने चारों बच्चों को बेहतरीन शिक्षा दिलाई और साथ खुद भी मेहनत करते रहे।  नशा, सिगरेट, शराब जैसी बुराइयों को न स्वयं किया और न ही बच्चों में इस तरह के संस्कार पनपने दिये।  पूर्ण रूप से शाकाहारी थे।  गांधी जी से प्रभावित थे।  बताया करते थे कि एक बार प्रतियोगिता में महात्मा गांधी जी के बारे में लिखना था।  प्रतियोगिता में भाग लिया और प्रथम पुरस्कार जीता।  चांदी का तमगा हासिल किया जो उनके पास काफी समय तक रहा।  फिर कहां चला गया पता नहीं।


मुझे यह भी ज्ञात है कि सुदर्शन को आप सभी का स्नेह मिलता है।  बहन लीला हों, कुसुम हों, चंचल हों, शोभा जी हों, भाई गुरमेल भमरा जी हों, रविन्दर सूदन हों, बेटे समान प्रकाश मौसम हों, इन्द्रेश उनियाल हों, गौरव द्विवेदी हों, और भी अनेक पाठक हैं जो सुदर्शन को उसकी रचनाओं पर प्रोत्साहन देते रहते हैं। बहन लीला तो रिकार्ड तोड़ लिखती हैं और सुदर्शन को मंच पर आगे लाने वाली भी वही हैं।  वह अनेक लेखकों को इस मंच पर आगे लाई हैं। मुझसे दो बार फोन पर भी बात हुई है। बहुत मीठा बोलती हैं। अच्छा बोलती हैं। मुझे अच्छा लगता है।  मैंने अपनी एक छोटी-सी कहानी आप सभी को सुनाई है।  आपने बहुत धैर्य और ध्यान से सुनी है मेरा विश्वास है। सुदर्शन की इच्छा पर मैं इन पुरानी कुछ यादों को समेट सकी हूं।  अभी तो बहुत कुछ बाकी है।  


मैं इस मंच से आप सभी को अपना स्नेह और आशीर्वाद देती हूं।  आप सभी खुश रहें और स्वस्थ रहें।  आजकल सभी कोरोना के प्रकोप से पीड़ित हैं।  अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है।  संभल कर रहें।  


अब मैं आप सभी को भारतीय स्वतन्त्रता दिवस की बधाइयां देती हूं और अनुरोध करती हूं कि आप भी अपने-अपने बच्चों के साथ अपने जीवन की यादों को साझा करें और समय मिले तो उन्हें स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी गाथाएं सुनाएं। ऐसा करने से जहां आप अपने बचपन में पहुंच जायेंगे वहीं आपके बच्चे आपके बारे में, देश के बारे में वैसा बहुत कुछ जान सकेंगे जो उन्हें जानना चाहिए।  आपसी संवादों के जरिए ही हम अपने संस्कारों को आगे बढ़ा सकते हैं।  फिर कभी और कहानी सुनाऊंगी।  तब तक ‘जय हिन्द’। 



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