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दरख़्त और परिन्दा

 

आम का बड़ा दरख़्त उम्रदराज हो चुका था ।  ऋतु अनुसार फल भी कम लगने लगे थे ।  आसपास के दूसरे आम के दरख़्तों पर मीठे आमों की बहार रहती थी ।  उम्रदराज़ आम के दरख़्त पर एक परिन्दा बचपन से वहीं पला और मीठे आम खाकर बड़ा हुआ था ।  आमों के साथ-साथ उसे उस दरख़्त से भी अपार प्रेम हो गया था ।  


‘मालिक, हमारे आमों के बगीचे में सैंकड़ों आम के दरख़्त हैं ।  मौसम के हिसाब से सभी दरख़्तों पर खूब आम लगते हैं ।  आमदनी भी खूब होती है ।  पर यह दरख़्त अब फल देने योग्य नहीं रहा ।  आम भी बहुत कम लगते हैं और जो लगते भी हैं तो वे परिन्दे चोंच मार कर खा जाते हैं ।  अब इससे उतनी आमदनी भी नहीं हो रही ।  ऐसे में क्या आम के इस दरख़्त को इसी तरह रहने दिया जाये या इसे काट कर इसकी लकड़ी बेच दी जाये और धन कमाया जाये ।  कटे हुए आम के दरख़्त की जगह आम के दरख़्त का नया बीज बो दिया जाये ।’ माली ने मालिक से पूछा ।  


‘हम कल बात करेंगे’ मालिक ने कहा और घर चला गया ।  


‘आपकी बात मैंने सुनी ।  मेरे ख्याल में तो आम के इस दरख़्त को अभी लगा ही रहने दो ।  आम थोड़े कम ही आयेंगे तो इससे क्या फर्क पड़ता है ?  कोई घाटा थोड़े ही होगा ।  इस बगीचे की शान है यह सबसे पुराना आम का दरख़्त । हमारे बच्चों ने भी इस आम के दरख़्त से कितने ही मीठे आम खाये हैं ।  कितने तो घोंसले इस पर परिन्दों ने बना रखे हैं ।  और अभी तो हरी पत्तियाँ भी आती हैं ।  फिर ज्यादा न सही कुछ आम तो फलते ही हैं ।’ मालकिन ने समझाने की कोशिश की ।  


मालकिन नहीं चाहती थी कि आम के उस दरख़्त पर बने घोंसले आम के दरख़्त की कटाई के साथ उजड़ जायें इसलिए उसने अपना पक्ष रख कर समझाने की बहुत कोशिश की थी ।  


मुद्रा कमाने वाले मालिक ने क्षण भर तो अपनी पत्नी की मानवीय संवेदना को सुना पर अगले ही पल वह व्यावहारिक हो गया था ।  ‘देखो, हर जीव की, हर दरख़्त की, हर पौधे की अपनी अपनी आयु होती है ।  उसकी आयु पूर्ण हो गई है ।  अब उसका त्याग करना ही उचित होगा ।’ मालिक अपनी पत्नी से बोला ।  ‘परिन्दों का क्या है, आज यहाँ तो कल वहाँ, वे तो अपना घोंसला बना ही लेंगे ।  हम लोग भी तो अपने 2-3 आशियाने बदल चुके हैं ।  ज़्यादा भावुक होना भी अच्छा नहीं होता ।  फिर जो आम का यह दरख़्त कटेगा तो उसकी जगह पर आम का नया पौधा भी तो रोपा जायेगा ।  वह भी समय के अनुसार फल देने लगेगा ।’ मालिक ने आगे बोलना ज़ारी रखा ।  


घर के लिये आय अर्जित करने वाले स्वामी के समक्ष मालकिन ने चुप्पी साध ली ।  पर अन्दर ही अन्दर वह आहत हुई थी ।


कुछ दिनों में लकड़ी के ठेकेदार आम के उस दरख़्त को देखने आते रहे और कीमत लगाते रहे ।  अलग अलग निगाहों से आम के उस दरख़्त को देखा जाता ।  कई कीमतें लगीं ।  आख़िर में एक ठेकेदार ने सबसे अधिक मूल्य लगाकर आम के उस दरख़्त को खरीद लिया ।  


‘इसे 2-3 दिन में काट कर ले जाओ’ माली ने कहा ।  


‘ठीक है, मैं कल ही दरख़्त काटने वाले भेज दूँगा ।’ ठेकेदार कहता हुआ चला गया ।  


आम का वह दरख़्त मनुष्य के लिए मूक था पर परिन्दों से बात कर सकता था ।  ‘तुम सब अपने घोंसले हटा लो ।  जब मैं कटूँगा तो तुम्हारे घोंसलों और बच्चों पर भी मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ेगा ।’ दरख़्त ने दुःखी होकर अपनी घनी डालियों पर रहने वाले परिन्दों से फरियाद की थी ।  


परिन्दे दरख़्त की बात सुनकर उदास हुए थे ।  वे उस दरख़्त को छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे पर मजबूर हो गये थे ।  सूर्यास्त होने तक परिन्दों ने आसपास के दरख़्तों में रहने वाले संबंधियों के घर अपने बच्चों को शिफ्ट कर दिया था ।  घोंसले तो वे ले नहीं जा सकते थे ।  अलबत्ता उन्होंने भारी मन से दूसरे दरख़्तों पर नये घोंसले बनाने शुरू कर दिये थे ।


‘खटाक’ ध्वनि के साथ उस दरख़्त का पहला हाथ अलग हो गया था ।  ठेकेदार के निर्मोही कर्मचारी कुल्हाड़ियों के साथ आ धमके थे और आते ही आम के इस दरख़्त पर निर्दय प्रहार करने शुरू कर दिये थे ।  परिन्दे वीभत्स कलरव कर रहे थे ।  मानो एक साथ सभी रुदन कर रहे हों ।  दरख़्त की शिराओं से रक्त प्रवाह हो रहा था जिसे केवल परिन्दे ही देख पा रहे थे ।  बीच बीच में जब लकड़हारे थक जाते तो वह आसपास के दरख़्तों की छाँव में बैठ जाते ।  वे भूल जाते कि वे उन्हीं दरख़्तों की छाँव में बैठे हैं जो उस दरख़्त के संबंधी हैं ।  कटती डालियों और गिरते घोंसलों को देखकर परिन्दों का चीत्कार और भी बढ़ गया था ।  आख़िर वह समय भी आया जब आम का वह विशाल दरख़्त धरती पर धराशायी हो गया था ।  उसका वजूद खत्म हो गया था ।  उसके हिस्सों को ट्राली में भर कर ले जाया गया और उस जगह मानो एक रिक्त स्थान पैदा हो गया था ।  जैसे किसी वयोवृद्ध महापुरुष के महाप्रयाण पर रिक्तता उत्पन्न हो जाती है और पीछे रहने वाले अपने उद्गार प्रकट करते हैं वैसे ही परिन्दों का स्वर बदल गया था और अब वे विलाप कर रहे थे ।


समय बीतता गया ।  उस कट चुके आम के दरख़्त की लकड़ियों को उस ठेकेदार के कारखाने में ले जाकर बड़े बड़े फट्टों की शकल दे दी गई थी ।  इधर बगीचे के स्वामी ने अपने बंगले में कुछ निर्माण करवाया था ।  वहाँ कुछ दरवाज़ों की आवश्यकता थी ।  अन्त में तय हुआ कि लकड़ी के दरवाजे़ ही लगवाये जायें ।  और ऐसा ही हुआ ।  बड़े से कमरे के द्वार पर विशाल लकड़ी का दरवाज़ा लगा दिया गया ।  बहुत ही खूबसूरत दरवाज़ा था ।  इस कमरे में गृहस्वामी और उसकी पत्नी रहने लगे थे ।  


उन दोनों को अक्सर उस दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज़ सुनाई देती ।  पर जब वे दरवाज़ा खोलते तो कोई नज़र नहीं आता ।  जब यह सिलसिला रोज़ होने लगा तो गृहस्वामी ने घर के नौकरों से दरवाज़े पर निगाह रखने के लिए कहा ।  नौकर दिन भर उस दरवाजे पर दृष्टि गड़ाए बैठे रहते ।  एक-दो दिन उन्होंने देखा कि उस दरवाज़े पर एक परिन्दा आता है और चोंच मार कर चला जाता है ।  उन्होंने इसे सामान्य घटना समझा ।  


सायँकाल को स्वामी ने नौकरों को बुलाकर कहा ‘आज फिर ठकठक हुई थी, तुमने क्या देखा, कौन ठकठक कर रहा था ?’ 


‘मालिक हमने तो नहीं देखा, हमारे सामने तो कोई भी नहीं आया जिसने ठकठक की हो ।’ नौकरों ने जवाब दिया ।  


मालिक सुनकर थोड़ा हैरान और परेशान हुआ ।  उसे अनजान डर सताने लगा ।  ठकठक का सिलसिला नियमित था ।  आखिर एक दिन उसने खुद ही निगाह रखने की सोची ।  नियत समय पर एक परिन्दा आया और दरवाजे पर कुछ देर तक चोंच मारता रहा और फिर उड़ गया ।  गृहस्वामी को ठकठक का राज़ समझ में आ गया ।  पर उसे यह समझ नहीं आया था कि वह परिन्दा रोज़ ही वहाँ क्यों आता है ?  


उसने अपने माली को बुलाकर पूछा ‘क्या तुम बता सकते हो यह परिन्दा रोज यहाँ दरवाजे पर ठकठक क्यों करने आता है ?’  


माली ने कहा, ‘मालिक, मैं तो नहीं बता सकता ।  पर एक बहेलिया मेरा मित्र है, वह परिन्दों की भाषा समझता है ।  मैं उसे बुला कर लाता हूँ ।  संभवतः वह बता सके।’ यह कर माली चला गया और अगले दिन बहेलिये को बुला लाया ।  


स्वामी, माली और बहेलिया दूर से दृष्टि गड़ाए रहे ।  नियत समय पर परिन्दा आया ।  कुछ देर दरवाज़े पर चोंच मारता रहा और फिर उड़ गया ।  


बहेलिया आश्चर्यचकित रह गया ।  उसने आकाश में दोनों हाथ उठाकर ईश्वर को प्रणाम किया ।  कुछ देर तक वह विस्मित रहा और फिर उसने दोनों से कहा ‘यह परिन्दा जो रोज़ खटखटाने आता है दरवाज़ा आपके घर का ... यह लकड़ी उसी दरख़्त की है जिस पर कभी आशियाना था उसका ।  यह परिन्दा रोज़ उसे मिलने आता है और जताता है कि हमारा तुम्हारा जन्म जन्म का साथ है ।  तुमने मुझे आश्रय दिया, बाद में तुम्हें काट दिया गया, पर मैं तुम्हें कैसे भुला सकता हूँ ।’  


यह सुनकर स्वामी और माली दोनों ही अवाक् रह गये ।  स्वामी ने तुरन्त पता करवाया कि उस दरवाज़े के लिए लकड़ी कहाँ से आई थी ।  पता चला कि वह लकड़ी उसी आम के दरख़्त की थी और उसी ठेकेदार के कारखाने से आई थी । यह पता चलते ही स्वामी का हृदय परिवर्तन हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि भविष्य में वह कभी कोई दरख़्त नहीं काटेगा ।  उसे दरख़्त और परिन्दे की संवेदना समझ में आ गई थी ।  


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