‘मम्मी, देखो वह लड़की छोटे-से रिंग में पूरी निकल गई’ लालबत्ती पर रुकी कार में बैठी वृतिका चिल्लाई।
‘अरे बेटी, यह इनका रोज़ का काम है।’
‘मम्मी ... वह उल्टा होकर चल रही है!’
‘हां बेटी, ये बच्चे ऐसे ही करतब करते है।’
हरी बत्ती हो गई। बच्चे दूसरी तरफ लालबत्ती होने पर चले गये। विराम नहीं, उनकी रोज़ी-रोटी है।
‘कहां से सीखते हैं?’
‘सड़कों पर मां-बाप को करते देखकर।’
‘हमें टीचर कई खेल सिखाते हैं पर ये नहीं।’
‘क्यों ज्यादा सोचती हो, ये ओलिम्पिक खेलने वाले सीखते हैं।’
‘क्या ये बच्चे बड़े होकर ओलिम्पिक में खेलने जायेंगे?’
‘नहीं बेटी।’
‘हमारे टीचर बताते हैं कि वहां जीतने पर मैडल मिलते हैं। ओलिम्पिक में भारत एकाध मैडल जीत पाता है। ये बच्चे बड़े होकर ओलिम्पिक्स में खेलेंगे तो ज़रूर मैडल मिलेगा, इन्हें हराना मुश्किल होगा!’
‘नहीं बेटी, इनकी किस्मत में ये सब कहां। ये खरपतवार की भांति है जो उगती है, हरी दिखती है, बस ...!’
‘खरपतवार! ... साइंस-टीचर ने बताया था ... वो तो ...’ कहती हुई वृतिका गुमसुम हो गई थी।
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